Thursday, January 26, 2012

आवाहन

घिरने लगीं घटायें छाने लगा कुहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुंवा सा
कोई मुझे बता दे क्या आज हो रहा है, मुख को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है
निस्तेज है हिमालय गंगा डरी हुई है, निस्तब्धता निशा की दिल में भरी हुई है
उन्माद बेकली का उत्थान मांगता हूँ,विस्फोट मांगता हूँ तूफ़ान मांगता हूँ -रामधारी सिंह "दिनकर जी"

Sunday, January 15, 2012

नेति -नेति

मै क्या हूँ -मै क्या करूँ?
मै प्रोफ़ेसर नहीं क़ि गुटबाजी करूँ
मै ब्रोकर भी नहीं क़ि सट्टे बाज़ी करूँ
मै पत्रकार भी नहीं क़ि ब्रेकिंग न्यूज़ प्रसारित करूँ
मै इंजीनियर भी नहीं क़ि किसी बिल्डिंग के नीचे तुम्हे दफ़न कर दूँ
मै क्या हूँ -मै क्या करूँ?

मै डाक्टर नहीं क़ि तुम्हारी किडनी बेच डालूं
मै मास्टर नहीं क़ि टयूसन न करने वालों को फेल कर डालूं
मै एम बी ऐ भी नहीं क़ि टाई लगा कर साबुन बेच डालूं
और मै बिल्डर भी नहीं जो तुम्हारी खेती उजाड़ डालूं
मै क्या हूँ -मै क्या करूँ?

मै नेता नहीं जो तुमसे कमीशन वसूलूं
मै अभिनेता नहीं जो तुम्हारे जज्बातों से खेलूं
मै गुंडा भी नहीं जो तुमसे हफ्ता वसूलूं
मै व्यापारी भी नहीं जो तुम्हे मिलावटी ढंग से तौलूं
मै क्या हूँ -मै क्या करूँ?

मै वकील नहीं जो तुम्हे कचेहरी में यमलोक दिखा सकूँ
मै अधिकारी भी नहीं जो तुम्हारी चमड़ी नोच सकूँ
मै कर्मचारी भी नहीं जो घूस के लिए तुम्हारी फाइल दबा सकूँ
मै कथा वाचक भी नहीं जो चैनलों पर तुम्हे बरगला सकूँ
मै विद्वान् भी नहीं क़ि हर बात पर अकड़ सकूँ
मै क्या हूँ -मै क्या करूँ?

सुना है मुझे तुम आम आदमी कहते हो
जिसे न अपना फेस पता है न अपनी बुक
तुम्हारी फेसबुकिया बेचैनी को जानकर तसल्ली हुई
सोचता हूँ उसे सत्तू में डालकर चटनी के साथ खाऊंगा
सदियों की भूख मिटाऊंगा -
और धन्य हो जाऊंगा -"ललित "

Sunday, January 8, 2012

कैलाश गौतम की रचना -कचहरी-

भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना

कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है

कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे

कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चुमतें है

कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे

कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे

लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है

कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुहं घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी

मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है

मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों नें घेरा सुझाया -बुझाया
वकीलों नें हाकिम से सटकर दिखाया

धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूंठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा

कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना

कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी ||
"कैलाश गौतम"

Monday, December 19, 2011

महान कवि अदम गोंडवी

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

Friday, December 16, 2011

मैं खुश हूँ-

मै खुश हूँ क़ि कचरे से दूर हूँ
क्योंकि मैं गाँव में हूँ अपनों की छाँव में हूँ ।
मै खुश हूँ क़ि मुझे सुबह-शाम कुत्ते नहीं टहलाने पड़ते
लूट हत्या वाली ख़बरें मेरे घर नहीं आतीं क्योंकि मेरे घर चैनल और अखबार नहीं आते ।
मै खुश हूँ क़ि मुझे शेयर बाज़ार का कीड़ा नहीं काटता
ट्रान्सफर पोस्टिंग का लफड़ा अपने जेहन में नहीं आता
घोटाले और घूस की अंकगणित मुझे नहीं आती
मैं विद्वान् भी नहीं जिस पर मैं घमंड करूँ सर पर लाद कर घूमता फिरूँ ...
फिर भी मै खुश हूँ क़ि उतना मैं भी खाता हूँ जितना वो नेता और प्रोफेसर
वो खाकर बीमार पड़ जाता है और मैं खाकर जी जाता हूँ
वो डर-डर खुदा खरीदने की कोशिश करता है
मैं दर-दर खुदा पा जाता हूँ
वो अपनी दुनिया में ही हार जाता है मैं खुद को हार कर सब जीत जाता हूँ
और इस तरह मैं खुश से खुश-नशीब होता जाता हूँ .-ललित

Friday, November 25, 2011

इक जानवर की जान आज इंसानों ने ली है --चुप क्यों है इंसान ?

आदमी का वहशीपन रह-रह कर जागता है और हम फिर यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं की हम सभ्य हुए भी कि नहीं ? उत्तराखंड के पौड़ी जिले में बून्खाल कालिका देवी मंदिर पर आज भैंसे और बकरों की बलि चढाने के लिए मनौती कर्ता उन्मादित हैं । जिस जानवर की बलि चढ़ाई जाती है उसे पहले खूब शराब पिलाई जाती है फिर उसे डंडे मारमार कर पूरे खेत में दौड़ाया जाता है इतना दौड़ाया जाता है कि उसकी जीभ लटक कर बाहर निकल आती है । जब थक जाता है तो फिर डंडे पड़ते हैं फिर से दौड़ता है और फिर कुछ तथाकथित धर्म के ठेकेदार उसकी गर्दन तलवार से काट देते हैं । इस तरह सैकड़ों बेजुबान जानवरों को तडपा-तडपा कर मार दिया जाता है और मान लिया जाता है कि देवी खुश हो गयी । पता नहीं देवी अपने बेजुबान बच्चों की हत्या पर कितना खुश होती होगी लेकिन इतना जरूर है कि हम कितना भी मोडर्न हो जाएँ वहशीपन का कीड़ा हमें रह-रह कर न जाने कब तक काटता रहेगा।

Thursday, November 24, 2011

फिर से-

सुना है कुछ बँट रहा है अरे यह तो यू.पी.हैघर-आंगन का बंटवारा , जमीन जायदाद का बंटवारा .......दिलों का बंटवारा ......कुछ दिनों बाद हर जिले में एक सी.ऍम और एक सचिवालय की मांग हम भी करेंगें