कुछ किस्से और कहानी थे उनमे राजा और रानी थे
वो प्यारा मौसम बीत गया जिसके आंगन में पानी थे
अंदाज़ जुदा अंदाजों का बचपन धूलों में लिपटा था
घर से भी बड़े घरौंदे थे छुटपन की अमिट निशानी थे
सेंठे की कलम सलोनी सी तख्ती पर सरपट चलती थी
दावातें टूटा करती थीं करतब अपने तूफानी थे
कुछ उल्टा सीधा करते थे बुनते थे कई विचार नए
कुछ जोड़ा तोडा करते थे वो नुस्खे क्या नादानी थे
बाबा के कन्धों पर चढ़कर अहसास निराला होता था
दादी के पीछे छुपते थे जब भी करते मनमानी थे
चिड़िया के पंखों को रंगते तितली ko पकड़ा करते थे
चंदा संग खाते दूध भात वो जज्बे क्या अरमानी थे
मांगे अपनी मनवा लेते जब अपने पर आ जाते थे
पापा से थोडा डरते थे मम्मी के संग शैतानी थे
वो किस्से हुए कहीं gum से लगता है हम हो गए बड़े
उस किस्से और कहानी के कुछ हिस्से यही जुबानी थे ।
- डॉ0 ललित नारायण मिश्र
Monday, May 16, 2011
Saturday, May 14, 2011
सियासी लोग
सियासी लोग
नदी के घाट पर यदि कुछ सियासी लोग बस जाएँतो प्यासे होंठ एक - एक बूँद पानी को तरस जाएँगनीमत है क़ि मौसम पर हुकूमत चल नहीं सकतीनहीं तो सारे बादल इनके खेतों में बरस जाएँ .--जमुना प्रसाद उपाध्याय (फैजाबाद )
नदी के घाट पर यदि कुछ सियासी लोग बस जाएँतो प्यासे होंठ एक - एक बूँद पानी को तरस जाएँगनीमत है क़ि मौसम पर हुकूमत चल नहीं सकतीनहीं तो सारे बादल इनके खेतों में बरस जाएँ .--जमुना प्रसाद उपाध्याय (फैजाबाद )
Thursday, May 12, 2011
Tuesday, May 10, 2011
Monday, May 9, 2011
भ्रष्ट..ठेकेदार
खड़े रहते हैं चौखट पर हिफाज़त के लिए हरदम
कहानी महल के भीतर की पहरेदार क्या जानें
इमारत बन गयी पूरी महज चौथाई पैसे में
गिरेगी किसके बच्चों पे ये ठेकेदार क्या जाने?-कुमार मनोज
कहानी महल के भीतर की पहरेदार क्या जानें
इमारत बन गयी पूरी महज चौथाई पैसे में
गिरेगी किसके बच्चों पे ये ठेकेदार क्या जाने?-कुमार मनोज
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