Thursday, January 31, 2013

मार्निंग वाक-

हिंदुस्तान में मार्निंग वाक पर निकलने वाली जनसँख्या इतनी बड़ी हो चली है कि यदि यह जनसँख्या निकटवर्ती किसानों के खेतों में कुछ काम कर अपनी चर्बी घटाए तो देश का उत्पादन कई गुना बढ़ सकता है .-सत्यमेव जयते

Friday, January 11, 2013

मुक्ति से गहरा बंधन का नाता-


सोचता हूँ मुक्त हो जाऊं
चाहता हूँ रिक्त हो जाऊं
दुखों से पार
उलझनों के पार

हर जगह जहाँ जाता हूँ आवाजें ही आवाजें पाता  हूँ
कभी बाहर की आवाजों से घबराता हूँ
कभी अन्दर की आवाजों को दबाता हूँ

मैं ढलता जाता हूँ उसी तरह जिस तरह दुनिया चाहती है
दुनिया  की नज़रों में अपनी अहमियत बनाये रखने को
मैं अपने को छोड़ता जाता हूँ -मोड़ता जाता हूँ

सारी शर्तों को मानने के बाद भी आवाजें पीछा नहीं छोड़तीं
पलट कर दुनिया को जवाब देने को जी चाहता है
फिर सोचता हूँ -
इस दुनिया ने ही तो मुझे दुनिया दी
हवा,पानी, निवाले, खुशी-गम, प्यार -तकरार
इसी मिट्टी के तो हैं जिस मिट्टी से हम हैं

मिट्टी से मिट्टी का पुराना नाता है
इसलिए यह जग लुभाता है
बार -बार हर बार लौट-लौट आता है
मुक्ति से ज्यादा गहरा बंधन का  नाता है
मुक्ति से ज्यादा गहरा बंधन का  नाता है -ललित 

Wednesday, December 19, 2012

तर्क और मौन -

तर्कों की दुनिया में चुप  रहने वाले अक्सर गुनहगार साबित कर दिए जाते हैं .-सत्यमेव जयते

Sunday, November 4, 2012

लौटने का इंतज़ार-


जो पन्ने नज़रों से गुज़रे थे कभी
दुबारा  पलटे  न जा सके
मै यह सोच कर उन्हें सहेजता रहा कि  कभी वक़्त मिलेगा
 उनसे रू -बरू होने का
खुद के खोने का .
इसी ख़याल में अक्सर खो जाता हूँ
कि कल जरूर बैठूँगा उनके पास
बिखरी इबादतों को समेट  कर उन्हें खुश कर लूँगा
जिन्दगी जी लूँगा .
मैं उन तक पहुँच तो जाता हूँ पर पकड़ नहीं पाता .
रोज़ देखता हूँ आलमारियों से कोई शिकायत करता है
 पूछता है मेरे लिए वक़्त कब आएगा?
मैं जिन्दगी की तेज़ रफ़्तार में फिर से कल मिलने की बात कह के निकल जाता हूँ .
वो किताब मेरे लौटने का इंतज़ार करती है
वो जिन्दगी मेरे लौटने का ऐतबार करती है .-ललित

Friday, November 2, 2012

जिन्दगी की गाड़ी जब -जब आउट ऑफ़ कण्ट्रोल होने लगे तब-तब हल्की सी ब्रेक लगा देनी चाहिए.-सत्यमेव जयते 

Saturday, October 27, 2012

Ek achhee rachna kisee achhe shayar kee-



जिन्दा रखता है मगर जीना मुहाल रखता है
मेरा मसीहा भी मेरा कितना ख्याल रखता है..
दिन तो गुजर जाता है पेट से वफा करने मेँ
रात को दिल मगर हजारोँ सवाल रखता है..
लाली चेहरोँ से सियासतदानोँ के टपकती रहती है
धन काला है मगर चेहरोँ को लाल रखता है..
फँसा लेता है सामने आ जाये कोई मछली अगर
छिपा कर अपने वजूद मेँ हर शख्स जाल रखता है..
बूढ़े बाप की दवाई की पर्ची खो जाती है अक्सर
मगर बेटा वसीयत को बहुत सम्हाल रखता है..
माँ ने एक उम्र तक धोयी थी उसकी गन्दगी 'हरमन'
वो माँ के पास जाता है, मुँह पर रुमाल रखता है........

राजनैतिक सुधार-

हिंदुस्तान में आर्थिक सुधारों के बाद समय आ गया है की राजनैतिक सुधारों की बात की जाय . राजनैतिक सुधारों की बात इसलिए भी जरूरी है क्योंकि राजा (शासक ) के भाग्य से प्रजा (देश )का भाग्य निर्धारित होता है . प्रजा अपने भाग्य और अपनी नियति से खुश नहीं और राजा को अपने आर्थिक सुधारों से फुर्सत नहीं .मसलन आर्थिक सुधार  के लिए  राजा के सभासद अपने-अपने क्षेत्र में विकास निधि की धनराशि  भी उसी व्यक्ति, स्कूल या ठेकेदार को देना पसंद करते हैं जो 40% उन्हें वापस लौटा दे .दाता भी खुश- पाता भी खुश ;दोनों मजे में हैं ,बीच में नाखुश इस देश का भाग्य है .जनता वोटर बनकर धन्य है ,कृतकृत्य है ; इलेक्टर बनने और इलेक्ट हो जाने की उसे फुर्सत भी नहीं है .-सत्यमेव जयते